आज फिर वो छत पर आई थी ।
धूप सोने सी चमक लिए आंगन में अंगड़ाई थी ।
चली हवा तो झूमे पंक्षी पत्तों में शहनाई थी ,
सामने वाली खिड़की पर पड़ी एक परछाईं थी ।
आज फिर वो छत पर आई थी ,
आज फिर वो छत पर आई थी ।
धूप बदन पर रेंगी उनके , जेहन में बिजली आई थी ,
चाय का प्याला लिए हाथ में हमसे नजर मिलाई थी ।
नज़र मिलाकर झुकाया चेहरा वो सहमी - घबराई थी ,
कहा मैंने प्यारी है मेंहदी , जुल्फे समेटकर शरमाई थी ।
आज फिर वो छत पर आई थी ,
आज फिर वो छत पर आई थी ।
होंठ सिकोड़ बोली मुझसे , इतनी हिम्मत जुटाई थी ,
लटे नाचती आंखो पर उनके जुल्फे वो हरजाई थी ।
सजल कमल सी होंठे उनकी घूम - घूम लहराई थी ,
पकड़ दुपट्टा सवारें हरदम मुझमें प्रेम ज्योत जलाई थी ।
आज फिर वो छत पर आई थी ,
आज फिर वो छत पर आई थी ।
आखिरी सिप्पी चाय की लेकर घड़ी विदाई की आई थी ,
चंद घड़ी और रुक जाओ , मेरी जुबान लड़खड़ाई थी ।
ये तन्हा भरे अल्फाज सुन "क्यों" कहकर मुस्कुराई थी ,
हाथ थामकर रोक लू उनको हृदय पथ की अगुआई थी ।
आज फिर वो छत पर आई थी ,
आज फिर वो छत पर आई थी ।
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